Thursday, 1 January 2015

यहां सोने वाला महीनों तक नहीं जागता


पिछले 4 सालों से उत्तरी कजाकिस्तान के कलाची गांव में कुछ ऐसा रहस्यमय घटित हो रहा है जिसका कारण समझने में बड़े-बड़े वैज्ञानिकों केपसीने छूट रहें हैं। गांव के लोग एक रहस्यमयी नींद की बीमारी से ग्रसित हैं। यहां किसी को भी, कभी भी कुछ भी करते हुए अचानक से नींद आ जाती है और उसकी यह नींद कुछ घंटों से लेकर कई महीनों तक जारी रह सकती है।
इस रहस्यमयी नींद की बीमारी के कारण इस गांव को स्लीपी हॉलो भी कहा जाने लगा है। इस रहस्यमयी बीमारी की शुरूआत अप्रैल 2010 में हुई थी और तब से 600 लोगों की अबादी वाले इस गांव में यह बीमारी बढ़ती जा रही है। हालात यह है कि अबतक गांव की 14 प्रतिशत आबादी इस बीमारी की चपेट में आ चुकी है। इस बीमारी की चपेट में आकर इस साल सितम्बर में 8 बच्चे स्कूल की असेम्बली के दौरान सोते हुए गिर गए थे, तभी से इन बच्चों के मां-बाप और डॉक्टर इनके जगने का इंतजार कर रहें हैं।
इस रहस्यमयी बीमारी के वास्तविक कारण का वैज्ञानिक अभी तक पता नहीं लगा सके हैं। जांच में सिर्फ यह पता लग पाया है कि इस बीमारी से पीडि़त मरीजों के दिमाग में एक खास तरह के तरल पदार्थ की मात्रा बढ़ जाती है। लेकिन एक सामान्य व्यक्ति के दिमाग में अचानक से इस तरल पदार्थ के बढऩे का क्या कारण है, वैज्ञानिकों को अभी तक नहीं समझ आया है। डॉक्टर इसका एक मात्र कारण प्रदूषित पानी को बता रहें हैं।
गौरतलब है कि कजाकिस्तान का यह गांव एक बंद हो चुकी यूरेनियम की खदान के पास स्थित है। पर विशेषज्ञों का कहना है कि गांव में रेडिएशन की मात्रा बेहद कम है और इस रहस्यमयी बीमारी के लिए इसे जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है।

मिजोरम को छह माह में मिले छह राज्यपाल


मिजोरम के राज्यपाल नियुक्त किए गए अजीज कुरैशी कांग्रेस शासित सीमावर्ती सूबे में पिछले छह माह में यह पद संभालने वाले छठे राज्यपाल होंगे। कुरैशी अब तक उत्तराखंड के राज्यपाल थे। कुरैशी ने कुछ माह पहले सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि केंद्र सरकार उन पर पद छोड़ने के लिए दबाव बना रही है। उन्होंने यह कदम केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के गठन के बाद पूर्ववर्ती संप्रग सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपालों पर पद छोड़ने के दवाब की खबरों के बीच उठाया था।
पूर्वोत्तर के इस राज्य में राज्यपालों के स्थानांतरण का सिलसिला करीब छह माह पहले तब शुरू हुआ जब राज्यपाल वीबी पुरुषोत्तमन को छह जुलाई को नगालैंड स्थानांतरित कर दिया गया। पुरुषोत्तमन ने इस पर आपत्ति जताते हुए इस्तीफा दे दिया। उन्होंने तब कहा था कि राज्यपालों को क्लर्क नहीं समझा जाना चाहिए। इसके बाद गुजरात की राज्यपाल कमला बेनीवाल को मिजोरम स्थानांतरित किया गया। 87 वर्षीय बेनीवाल ने नौ जुलाई को यह पदभार संभाला लेकिन उन्हें एक महीने से भी कम समय में इस पद से हटा दिया गया। इसके बाद पूर्व केंद्रीय गृह सचिव वीके दुग्गल जो उस समय मणिपुर के गवर्नर थे, को मिजोरम भेजा गया।
दुग्गल ने आठ अगस्त को पदभार संभाला, लेकिन 20 दिन बाद ही इस्तीफा दे दिया। दुग्गल के इस्तीफे के बाद महाराष्ट्र के राज्यपाल के शंकरनारायणन को यहां भेजा गया लेकिन उन्होंने भी तबादले के तुरंत बाद इस्तीफा दे दिया। इसके चलते सेवानिवृत्त आइपीएस ऑफिसर और मेघालय के तत्कालीन गर्वनर केके पॉल को 16 सितंबर को मिजोरम का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। अब दो सप्ताह के अवकाश के बाद 74 वर्षीय कुरैशी जनवरी के तीसरे सप्ताह में मिजोरम के 15वें राज्यपाल के रूप में पदभार संभालेंगे।

अब झूठ बोलकर पॉलिसी बेची तो फंसेगी कंपनी


लंबे इंतजार और खासी ऊहापोह के बाद आखिरकार नरेंद्र मोदी सरकार बीमा अध्यादेश ले ही आई है और उसके जरिये बीमा क्षेत्र में ऐसे कई सुधारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है, जिनकी दरकार बहुत अरसे से बताई जा रही थी। वित्त मंत्रालय इसे लेकर बहुत उत्साहित है क्योंकि इसमें बीमा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की सीमा बढ़ाकर 49 फीसदी कर दी गई है, जो अभी तक 26 फीसदी ही थी। जाहिर है कि ऐसे में विदेशी बीमा कंपनियां यहां आएंगी और भारी मात्रा में डॉलर भी इधर का रुख करेंगे। बहरहाल यह तो अर्थनीति की बातें हैं, जिनसे अक्सर आम आदमी को कम सरोकार ही होता है। उसके लिए तो अहम यह है कि सरकार के इस कदम से उसे क्या फायदा होने जा रहा है। यह सवाल मौजूं भी है क्योंकि बीमा पॉलिसी ही ऐसा जाल होता है, जिसमें निकलना अक्सर लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है। एक बार गलत पॉलिसी लेने के बाद कई बार लोग पछताते हैं, लेकिन बाहर नहीं निकल पाते। बहरहाल बीमा कानून में जो बदलाव इस अध्यादेश के जरिये किए गए हैं, उनसे आपको कम पेचीदगियों और अधिक पारदर्शिता वाली बीमा पॉलिसी मिलने जा रही है। आपको बीमा एजेंट पर कम से कम निर्भर रहना पड़ेगा और प्रीमियम के भुगतान में भी आपको खासी ढील मिल जाएगी। सबसे अहम बात है कि इसमें आपको बहकावा देकर गलत पॉलिसी नहीं बेची जा सकती और पॉलिसी के दावे का निपटारा भी जल्द होगा। आइए देखते हैं कि यह सब कैसे होगा। गलत पॉलिसी बेचना मुमकिन नहीं सबसे पहला और बड़ा फायदा तो यह है कि बीमा कंपनी अथवा एजेंट अब आपको बहका नहीं सकते। अभी तक ज्यादा से ज्यादा ग्राहक पटाने और अपना कारोबार बढ़ाने के फेर में कंपनियां यह नहीं देखती थीं कि उनके एजेंट किस तरह से पॉलिसी बेच रहे हैं। एजेंट भी प्रीमियम के लालच में अक्सर झूठ बोलकर पॉलिसी बेचा करते थे। इसका अंदाजा ग्राहक को तब होता था, जब वह दावा करने जाता था और उसे बैरंग लौटा दिया जाता था। अक्सर ऐसे मामले अदालतों में फंसे रहते थे, लेकिन बीमा कानून में ऐसी कंपनियों के खिलाफ सख्त प्रावधान कर दिए गए हैं। अब अगर यह साबित हो जाता है कि किसी एजेंट ने झूठ बोलकर पॉलिसी बेची है अथवा आचार संहिता का उल्लंघन किया है तो एजेंट के बजाय कंपनी की ही गर्दन पकड़ ली जाएगी। संशोधन के बाद बनने वाले कानून के तहत ऐसी कंपनी पर एक करोड़ रुपए तक का जुर्माना लगाया जाएगा। इसी तरह अगर एजेंट पॉलिसी खरीदने वाले को रिश्वत देते हैं तो कंपनी पर पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। जाहिर है कि ऐसी सूरत में कंपनियां खुद ही एजेंटों की हरकतों पर लगाम कसेंगी और आपको पारदर्शी तरीके से पॉलिसी मिलेंगी। दावा नहीं होगा खारिज मौजूदा कानून के मुताबिक पॉलिसी खरीदने के दो साल बाद अगर आप दावा करते हैं तो कंपनी उसे खारिज नहीं कर सकती, लेकिन कंपनी अगर यह साबित कर देती है कि आपका दावा खारिज कर दिया जाएगा और आपको एक पाई भी नहीं मिलेगी। बहरहाल नए बीमा कानून की धारा 45 में कहा गया है कि बीमा पॉलिसी खरीदने के तीन साल बाद आपका दावा किसी भी सूरत में खारिज नहीं किया जा सकता। जानकार बताते हैं कि ऐसी सूरत में कंपनियों को फर्जी दावों का भी निपटारा करना होगा, जिससे ईमानदार लोगों के लिए प्रीमियम बढ़ सकता है, लेकिन इससे सही दावा करने वाले को फायदा होगा क्योंकि कंपनी जानबूझकर उसके दावे को खारिज नहीं कर सकेगी। एजेंट को अंधाधुंध कमीशन नहीं एजेंटों को झूठ बोलकर पॉलिसी बेचने से रोकने के लिए इस कानून में उनके कमीशन की अधिकतम सीमा भी तय कर दी गई है। अभी तक कुछ खास पॉलिसियों मसलन यूलिप आदि को बेचने पर कंपनियां एजेंट को अंधाधुंध कमीशन देती थीं क्योंकि उन पॉलिसियों में कंपनियों को खासा फायदा होता था। ऐसी सूरत में अक्सर शुरुआती तीन साल तक ग्राहक के प्रीमियम का बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में कट जाता था, लेकिन अब एजेंटों के लिए कमीशन की सीमा तय कर दी गई है और कोई कंपनी उससे अधिक कमीशन नहीं दे सकती। ऐसे में आप निश्चिंत हो सकते हैं कि एजेंट आपको कोई गलत पॉलिसी नहीं बेचेंगे क्योंकि उनका कमीशन बढऩे नहीं जा रहा। पॉलिसी का हस्तांतरण हमारे देश में बीमा पॉलिसी अपने या परिवार के लिए ली जाती है और उसका फायदा वे लोग ही उठा पाते हैं, लेकिन बदले हुए कानून के तहत आप अपनी पॉलिसी किसी अन्य व्यक्ति के नाम ट्रांसफर कर सकते हैं। इसके लिए आपको ट्रांसफर करने की वजहें बतानी होंगी। अगर बीमा कंपनी आपकी बताई वजहों से सहमत होती है तो बीमा पॉलिसी पर उस व्यक्ति का अधिकार हो जाता है। वह पॉलिसी पर कर्ज ले सकता है और जब चाहें पॉलिसी को सरेंडर भी कर सकता है। शिकायतों का निपटारा बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायत होने पर अक्सर ग्राहकों को जहां-तहां भटकना पड़ता है या उन्हें पता नहीं होता कि शिकायत करने का सही मंच क्या है। कानून में बदलाव के साथ ही सरकार ने आपको मंच भी मुहैया करा दिया है। इसमें स्वतंत्र शिकायत निपटारा प्राधिकरण बनाने की बात है, जिसके पास दीवानी अदालत के बराबर ताकत होगी।

अब पोस्ट ऑफिस में भी चलेंगे एटीएम कार्ड



पोस्ट ऑफिस में खाता रखने वालों के लिए खुशखबरी. सरकार देश भर में डाक घर की चुनिंदा शाखाओं को एटीएम कार्ड की सुविधा देने जा रही है. एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक अब ये शाखाएं अपने ग्राहकों को एटीएम कार्ड जारी कर सकेंगी. पैसे निकालने के लिए उन्हें डाकघर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. इसके अलावा ये डाकघर बैंकों की तरह ही अपने ग्राहकों को उनके खाते का स्टेटमेंट भी देंगे. मंगलवार को सरकार ने एक अधिसूचना जारी करके पोस्ट ऑफिस कानून, 1981 में बदलाव कर दिया. अब पोस्ट ऑफिस कई तरह की सुविधाएं दे सकेंगे. अब वे शाखाएं जहां इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग है और जहां कोर बैंकिंग के सॉफ्टवेयर हैं, एटीएम कार्ड जारी करेंगे. ग्राहकों को अब इन पोस्ट ऑफिसों में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि वे ऑनलाइन ही पैसा ट्रांसफर कर सकेंगे. ये किसी बैंक की ही तरह काम करेंगे. देश भर में डेढ़ लाख से भी ज्यादा डाकघर हैं और उनमें से 90 फीसदी गांवों में हैं.


अब पोस्ट ऑफिस में भी चलेंगे एटीएम कार्ड




बिना सब्सिडी वाला सिलेंडर और विमान ईंधन हुआ सस्ता


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में लगातार आ रही गिरावट के कारण बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर में लगातार चौदहवीं बार कटौती की गयी है जबकि उड्डयन ईंधन भी आज से 12.5 प्रतिशत सस्ता हो गया है। तेल विपणन क्षेत्र की अग्रणी कंपनी इंडियन ऑयल की तरफ से दी गई जानकारी के अनुसार दिल्ली में बिना सब्सिडी वाला 14.2 किलोग्राम का रसोई गैस सिलेंडर 43.50 रुपए सस्ता किया गया है। दिल्ली में अब यह 708.50 रुपए का मिलेगा। बिना सब्सिडी वाले सिलेंडर में यह लगातार 14वीं बार कमी की गई है और पिछले एक साल में इसके दाम में 532.50 रुपए प्रति सिलेंडर की भारी कमी आई है। गत 04 जनवरी को बिन सब्सिडी वाला सिलेंडर दिल्ली में 1241 रुपए का था। सरकार रसोई गैस उपभोक्ता को एक वित्तीय वर्ष के दौरान 12 सिलेंडर सब्सिडी दर पर उपलब्ध कराती है जिसकी कीमत दिल्ली में 417 रुपए है। इससे अधिक सिलेंडर लेने पर उपभोक्ता को बाजार कीमत के अनुसार भुगतान करना होता है। हाल ही में सरकार ने पांच किलो वाले 34 सिलेंडर सब्सिडी रेट पर देना शुरू किया है। उपभोक्ता के पास विकल्प है कि वह एक वित्त वर्ष के दौरान 14.2 किलोग्राम के 12 या पांच किलोग्राम वाले 34 सिलेंडर सब्सिडी पर ले सकता है। 

  शंघाई में नए साल का जश्न मातम में बदला, 35 की मौत


शंघाई में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर शहर के प्रख्यात पर्यटन स्थल बुंद में एक आयोजन के दौरान हुई भगदड़ में 35 लोगों की मौत हो गई और 42 घायल हो गए। सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ की खबर के अनुसार, बताया जाता है कि शंघाई के चर्चित बुंद इलाके में स्थित चेन्यी स्क्वायर पर स्थानीय समयानुसार रात 11 बजकर करीब 35 मिनट पर लोग अमेरिकी डॉलर जैसे दिखाई दे रहे कूपन एकत्र करने में जुटे थे। उसी दौरान यह हादसा हुआ। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि 'डॉलर बिल' की तरह नजर आने वाले कुछ कूपन बुंद के समीप इमारत की तीसरी मंजिल की खिड़की से नीचे फेंक दिए गए और नीचे नदी के किनारे खड़े लोगों में उन्हें लेने के लिए होड़ मच गई। खबर के अनुसार, इसी दौरान हादसा हुआ। घायलों में कई छात्र हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि भगदड़ कैसे मची। घटना की जांच की जा रही है। शहर के प्रशासन ने बचाव अभियानों और उसके बाद की स्थिति से निपटने के लिए एक टीम तैयार की है। प्रख्यात बुंद इलाका शंघाई में नव वर्ष की पूर्व संध्या पर कार्यक्रमों का आयोजन करने के लिए पसंदीदा स्थान है। आम तौर पर इस दौरान यहां करीब 3,00,000 लोग आते हैं।